प्रश्न 1: 'पथेर पांचाली' फ़िल्म की शूटिंग का काम ढाई साल तक क्यों चला?
उत्तर: 'पथेर पांचाली' की शूटिंग ढाई
साल तक चलने के दो मुख्य कारण थे। पहला, लेखक सत्यजित राय तब एक विज्ञापन कंपनी में
नौकरी करते थे और उन्हें केवल फुर्सत मिलने पर ही शूटिंग का समय मिलता था। दूसरा
और प्रमुख कारण पैसों की कमी थी। पैसे खत्म हो जाने पर शूटिंग रोकनी पड़ती थी और
दोबारा पैसे जमा होने पर ही काम शुरू हो पाता था।
प्रश्न 2: 'काशफूलों' वाले दृश्य की शूटिंग में
क्या समस्या आई और उसे कैसे पूरा किया गया?
उत्तर: रेलगाड़ी वाले दृश्य में
अपू और दुर्गा को काशफूलों के मैदान से दौड़ना था। आधा दृश्य शूट करने के एक
हफ़्ते बाद जब टीम वापस लौटी, तो सारे काशफूल जानवर खा गए थे। इससे दृश्य की निरंतरता ('कंटिन्युइटी')
बनाए रखना
असंभव हो गया। इसलिए, बाकी हिस्से की शूटिंग अगले साल शरद ऋतु में की गई, जब मैदान फिर
से काशफूलों से भर गया।
प्रश्न 3: 'भूलो' कुत्ते के दृश्य को
फ़िल्माने में क्या समस्याएँ आईं और उनका समाधान कैसे किया गया?
उत्तर: एक दृश्य में 'भूलो' कुत्ते को
सर्वजया द्वारा फेंका हुआ भात खाना था। पैसों की कमी के कारण यह दृश्य उस दिन पूरा
नहीं हो सका। जब टीम छह महीने बाद वापस आई, तो पता चला कि भूलो कुत्ते
की मृत्यु हो गई है। तब भूलो जैसा ही दिखने वाला एक और कुत्ता गाँव से ढूंढा गया
और उससे बचे हुए दृश्य की शूटिंग पूरी की गई।
प्रश्न 4: श्रीनिवास मिठाईवाले की मृत्यु के बाद उससे जुड़े
दृश्यों को किस प्रकार फ़िल्माया गया?
उत्तर: मिठाईवाले श्रीनिवास का कुछ
अंश चित्रित होने के बाद शूटिंग महीनों के लिए स्थगित हो गई थी। जब टीम वापस लौटी
तो उस भूमिका को निभाने वाले सज्जन का देहांत हो चुका था। तब निर्देशक ने उसी
कद-काठी के एक दूसरे व्यक्ति को चुना, जिनका चेहरा मिलता-जुलता नहीं था। उनसे कैमरे की
ओर पीठ करवाकर मुखर्जी के घर में जाते हुए शॉट लिया गया, जिससे दर्शक यह अंतर पहचान
नहीं पाए।
प्रश्न 5: बारिश का दृश्य चित्रित करने में क्या मुश्किलें
आईं और उनका समाधान किस प्रकार हुआ?
उत्तर: लेखक के पास बरसात के मौसम
में पैसे नहीं थे, जिस कारण वे बारिश का दृश्य नहीं फिल्मा सके। जब पैसे आए,
तब अक्टूबर का
महीना था और आसमान साफ़ रहता था। लेखक रोज़ अपनी टीम के साथ देहात में जाकर बारिश
का इंतज़ार करते। आख़िरकार, शरद ऋतु में एक दिन अचानक ज़ोरदार बारिश हुई और उसी में
भीगते हुए दुर्गा और अपू का वह प्रसिद्ध दृश्य फिल्माया गया।
प्रश्न 6: अपू की भूमिका के लिए कलाकार की खोज किस प्रकार
पूरी हुई?
उत्तर: अपू की भूमिका के लिए छह
साल का लड़का नहीं मिल रहा था, जिसके लिए अखबार में विज्ञापन भी दिया गया। बहुत से लड़के
इंटरव्यू के लिए आए, पर कोई भी उपयुक्त नहीं लगा। एक पिता
तो अपनी बेटी के बाल कटवाकर उसे लड़का बनाकर ले आए थे। अंत में, लेखक की पत्नी
ने पड़ोस के घर की छत पर एक लड़के को देखा, जिसका नाम सुबीर बनर्जी था,
और वही 'पथेर पांचाली'
का 'अपू' बना।
प्रश्न 7: फ़िल्म में रेलगाड़ी के दृश्य को कैसे फ़िल्माया
गया था?
उत्तर: रेलगाड़ी का दृश्य फिल्माने
के लिए एक ही ट्रेन से काम नहीं चला, इसलिए तीन अलग-अलग ट्रेनों का इस्तेमाल किया
गया। लेखक चाहते थे कि सफ़ेद काशफूलों की पृष्ठभूमि पर ट्रेन से काला धुआँ निकले,
जो दृश्य को
सुंदर बनाएगा। इसके लिए टीम के एक सदस्य अनिल बाबू इंजन में सवार हो जाते थे और
शूटिंग की जगह पास आते ही बॉयलर में कोयला डलवाते थे, ताकि गाढ़ा काला धुआँ निकल
सके।
प्रश्न 8: बोडाल गाँव में शूटिंग के दौरान फ़िल्मकारों को
किन दो विचित्र व्यक्तियों के कारण परेशानी हुई?
उत्तर: बोडाल गाँव में टीम को दो
लोगों से परेशानी हुई। एक थे 'सुबोध दा', जो मानसिक रूप से बीमार थे और शुरू में फ़िल्म वालों को
लाठियों से मारने की बात करते थे। दूसरे, पड़ोस में एक धोबी रहता था, जो कभी भी 'भाइयों और
बहनों' कहकर किसी
राजनीतिक मुद्दे पर भाषण शुरू कर देता था, जिससे साउंड रिकॉर्डिंग में बाधा आ सकती थी।
प्रश्न 9: शूटिंग वाले घर में साउंड-रिकॉर्डिस्ट भूपेन
बाबू के साथ कौन-सी डरावनी घटना घटी?
उत्तर: भूपेन बाबू रिकॉर्डिंग मशीन
लेकर एक कमरे में बैठते थे। एक दिन शॉट के बाद जब उनसे साउंड के बारे में पूछा गया
तो कोई जवाब नहीं आया। लेखक ने कमरे में जाकर देखा तो एक बड़ा साँप खिड़की से नीचे
उतर रहा था, जिसे देखकर
भूपेन बाबू डर से सहम गए थे और उनकी बोलती बंद हो गई थी। स्थानीय लोगों ने उसे 'वास्तुसर्प'
बताकर मारने से
मना कर दिया।
प्रश्न 10: पाठ के आधार पर यह कैसे कहा जा सकता है कि
सत्यजित राय फ़िल्म को एक कला-माध्यम के रूप में देखते थे, व्यावसायिक-माध्यम
के रूप में नहीं?
उत्तर: यह कहना उचित है कि सत्यजित राय फ़िल्म को कला-माध्यम मानते थे। उन्होंने पैसों की तंगी के बावजूद कला से समझौता नहीं किया। काशफूलों वाले दृश्य के लिए उन्होंने एक साल इंतज़ार किया, लेकिन नकली फूलों से काम नहीं चलाया। ढाई साल तक आर्थिक और अन्य समस्याओं से जूझते हुए अपनी कला-दृष्टि को साकार करना यह साबित करता है कि उनके लिए फ़िल्म व्यवसाय से पहले एक कला थी।
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