प्रश्न 1: शिवशंभु की दो गायों की कहानी के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है?
उत्तर: दो गायों की कहानी के माध्यम से लेखक यह कहना चाहता है कि भारत में बिछड़ने का दुख बहुत गहरा होता है, यहाँ तक कि जानवरों में भी। एक बलवान गाय कमज़ोर गाय को मारती थी, फिर भी उसके जाने पर कमज़ोर गाय दुखी होकर भूखी रही। लेखक यह दर्शाना चाहता है कि जिस देश में पशुओं में भी बिछड़ते समय इतनी करुणा होती है, वहाँ कर्जन के जाने पर दुख होना स्वाभाविक है।
प्रश्न 2: लेखक ने 'तीसरी शक्ति' किसे कहा है और क्यों?
उत्तर: विदाई संभाषण पाठ में तीसरी शक्ति से लेखक का आशय ‘ब्रिटिश साम्राज्य’ से है, जिसमें लॉर्ड कर्जन और भारतीय जनता के बीच इंग्लैंड के शासक वर्ग का प्रभाव था। कर्जन की हर हरकत और भारतीय जनता की स्थिति ब्रिटिश हितों से प्रभावित थी और ब्रिटिश सरकार ही ऐसी शक्ति थी जो इन दोनों के बीच के सभी निर्णयों को प्रभावित करती थी।
प्रश्न 3: लॉर्ड कर्जन को इस्तीफ़ा क्यों देना पड़ा?
उत्तर: लॉर्ड कर्जन अपनी पसंद के एक अंग्रेज़ सैन्य अधिकारी को काउंसिल में नियुक्त करवाना चाहते थे, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने उनकी सिफारिश को अस्वीकार कर दिया। इसे उन्होंने अपना अपमान समझा। जब उनके पद-त्याग की धमकी भी काम न आई, तो उन्हें जंगी लाट (कमांडर-इन-चीफ) के मुकाबले नीचा देखना पड़ा। इसी से क्षुब्ध होकर उन्होंने गुस्से में इस्तीफ़ा दे दिया, जिसे मंजूर भी कर लिया गया।
प्रश्न 4: 'आठ करोड़ प्रजा के गिड़गिड़ाकर विच्छेद न करने की प्रार्थना' से किस ऐतिहासिक घटना की ओर संकेत है?
उत्तर: इस पंक्ति से बंगाल विभाजन (बंग-विच्छेद) की ऐतिहासिक घटना की ओर संकेत किया गया है। लॉर्ड कर्जन ने 1905 में बंगाल का विभाजन कर दिया था। लेखक बताते हैं कि बंगाल की आठ करोड़ जनता ने कर्जन से विभाजन न करने के लिए आँसू बहाकर प्रार्थना की, लेकिन उन्होंने अपनी ज़िद में किसी की एक न सुनी और बंगाल को विभाजित कर दिया।
प्रश्न 5: लेखक ने कर्जन की ज़िद को नादिरशाह से भी बढ़कर क्यों बताया है?
उत्तर: लेखक ने कर्जन की ज़िद को नादिरशाह से भी बड़ा बताया है क्योंकि क्रूर नादिरशाह ने भी आसिफ़जाह के कहने पर दिल्ली में कत्लेआम तुरंत रोक दिया था। इसके विपरीत, लॉर्ड कर्जन ने बंगाल की आठ करोड़ प्रजा की विभाजन न करने की प्रार्थना पर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया। यह दिखाता है कि कर्जन अपनी ज़िद के आगे किसी की भी बात सुनने को तैयार नहीं थे।
प्रश्न 6: "कितने ऊँचे होकर आप कितने नीचे गिरे!" आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस कथन का आशय लॉर्ड कर्जन की सत्ता और सम्मान के शिखर से अचानक पतन की ओर है। दिल्ली दरबार में उनकी शान बादशाह के भाई से भी बढ़कर थी और उनकी कुर्सी सोने की थी। उनका दर्जा ईश्वर और महाराज एडवर्ड के बाद तीसरा था। लेकिन एक मामूली फौजी अफसर की नियुक्ति के विवाद में उन्हें नीचा देखना पड़ा और इस्तीफ़ा देकर जाना पड़ा।
प्रश्न 7: पाठ के आधार पर लॉर्ड कर्जन के शासनकाल का अंत 'घोर दुखांत' क्यों रहा?
उत्तर: कर्जन के शासनकाल का अंत 'घोर दुखांत' रहा क्योंकि उन्होंने स्वयं अपने शासन को सुखांत समझकर खेलना शुरू किया था, पर अंत दुखद हुआ। उन्होंने भारत में अशांति फैलाई और प्रजा को सुखी नहीं होने दिया। अंत में, जिस ज़िद ने भारतीय प्रजा को पीड़ित किया, उसी ज़िद के कारण वे स्वयं अपमानित होकर अपने पद से हटा दिए गए और उनका गौरव नष्ट हो गया।
प्रश्न 8: लेखक लॉर्ड कर्जन से विदाई के समय किस प्रकार के संभाषण की अपेक्षा कर रहा था?
उत्तर: लेखक अपेक्षा कर रहा था कि कर्जन जाते समय राजकुमार नर सुलतान की तरह भारत की भूमि का आभार व्यक्त करेंगे। वे यह स्वीकार करेंगे कि उन्होंने भारत से सब प्रकार का लाभ उठाया और उसके बिगाड़ने में कोई कमी नहीं रखी। लेखक चाहते थे कि कर्जन भारत के उज्ज्वल भविष्य और प्राचीन गौरव को फिर से प्राप्त करने का आशीर्वाद देकर जाते, पर वे कहते हैं कि कर्जन में इतनी उदारता नहीं थी।
प्रश्न 9: 'विदाई-संभाषण' पाठ में भारतीयों की बेबसी और लाचारी को किस प्रकार व्यक्त किया गया है?
उत्तर: पाठ में भारतीयों की बेबसी इस बात से व्यक्त होती है कि वे केवल कर्जन के जाने की दिन-रात प्रार्थना कर सकते थे। उनकी आठ करोड़ की गिड़गिड़ाहट भी कर्जन की ज़िद (बंग-विच्छेद) को नहीं रोक सकी। लेखक कहते हैं कि अगर प्रजा के पास कहीं और जाने की जगह होती तो वह नाराज़ होकर यह देश छोड़ जाती, पर बेबस होकर उसे सब दुख झेलने पड़ रहे थे।
प्रश्न 10: पाठ के अनुसार 'शासन' का वास्तविक अर्थ क्या होना चाहिए?
उत्तर: पाठ के अनुसार शासन का अर्थ मनमाने ढंग से हुक्म चलाना और प्रजा की बातों को अनसुना करना नहीं है। लेखक यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या प्रजा को दबाकर उसकी इच्छा के विरुद्ध काम करना ही शासन है। उनका आशय है कि एक सच्चे शासक का कर्तव्य प्रजा की बात सुनना, उनके हितों का ध्यान रखना और ज़िद छोड़कर उनके अनुरोध का सम्मान करना होता है।
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